माँ दुर्गा के सातवा रूप माँ कालरात्रि जी को कैसे करें प्रसन्न ताकि जीवन के सारे दुख पलक झपकते दूर हो जाए माँ की पूजा कैसें करे माँ को कौन सा फल चढाया जाता है और माँ अपने भक्त पर कैसे बरसाती हैं कृपा चलिए हम आप को बतातें हैं। सबसे पहले माँ कालरात्रि की पूजा सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना पुरे मन से करें फिर मन को आज्ञा चक्र में स्थापित करने हेतु मां का आशीर्वाद लेना चाहिए। साधना में बैठना चाहिए इस प्रकार जो साधक प्रयास करते हैं उन्हें भगवती कालरात्रि सभी प्रकार के भय से मुक्त करती हैं।Also Read - Viral Video: Sola Civil Hospital Staff Playing Garba inside ICU ward in Ahmedabad | वायरल वीडियो: आईसीयू में मरीज के सामने हॉस्पिटल स्टाफ ने किया गरबा

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नाम से अभिव्यक्त होता है कि मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है। माँ कालरात्रि के तीन नेत्र हैं, उनकी सांसो से जवाला निकलती है। माता की सवारी है गर्दभ। माँ को मानने वाले भक्त हमेशा निडर रहते हैं। माँ का जहा वास होता है वह कोई भी बुरी बुरी सकती नही रहती माता के सामने दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं। यह भी पढ़ें: माँ दुर्गा जी का सातवां स्वरूप: माँ कालरात्रि Also Read - Fifth day of navratri | माँ दुर्गा का पांचवा स्वरुप: माँ स्कंदमाता

आज के दिन आपको माता को फूल के साथ मिठाई चढ़ा कर पूजा करना चाहिए। साथ ही गरीबो में कोई वास्तु का दान करे घर में सुख आएगा। आज के दिन आपको सफ़ेद रंग का वस्त्र पहनना चाहिए। आज व्रत में फल और अन्य व्रत में खाने वाली चीजें खा सकते है। ध्यान रखे की आप दिन में केवल दो बार फल या किसी अन्य चीज़ का सेवन कर रहे है। आज के दिन माँ के इस रूप की पूजा करने वाले भक्त पर जीवन में आई सभी कष्टों से मुक्ति देकर माँ जीवन को मंगलमय बनती हैं। पूजा के समय माता के इस मंत्र का आज उच्चारण करें घर में सुखसमृद्धि वास होगा। ये ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।

“एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।                                                                                                                                                  वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥