शंख से क्यों नहीं होता है भगवान शिव का जलाभिषेक?

09 Dec, 2025

Shilpi Singh

दरअसल में शिवपुराण की कथा के अनुसार शंखचूड नाम का एक महापराक्रमी दैत्य था.

दैत्यराज दंभ की कोई संतान नहीं थी, उसने संतान प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की कठिन तपस्या की थी

दैत्यराज के कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और दंभ ने तीनों लोकों के लिए अजेय महापराक्रमी पुत्र का वर मांगा.

इसके बाद दंभ के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम शंखचुड़ पड़ा, शंखचुड ने पुष्कर में ब्रह्माजी को खुश करने के लिए घोर तपस्या किया

प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव ने वर मांगने के लिए कहा शंखचूड ने वर मांगा कि वो देवताओं के लिए अजेय हो जाए, ब्रह्माजी ने तथास्तु कहकर उसे श्रीकृष्णकवच दे दिया

इसके बाद ब्रम्हाजी ने शंखचूड के तपस्या से प्रसन्न होकर उसे धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा देकर वे अंतर्धान हो गए, ब्रह्मा की आज्ञा से तुलसी और शंखचूड का विवाह संपन्न हुआ

शंखचूड ने अहम में आ गया, शंखचूड़ से त्रस्त होकर देवताओं शंकर जी की आराधना की, जिसके बाद शिवजी ने देवताओं की रक्षा के लिए चल दिए

लेकिन श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल रहे

जिसके बाद विष्णु जी ने ब्रम्हाण रूप धारण कर दैत्यराज से श्रीकृष्णकवच दान में लिया और शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी की तपस्या भंग कर दी

इसके बाद भगवान शिव ने अपने त्रिशुल से शंखचूड़ का वध किया. ऐसी मान्यता है कि शंकचूड़ की हड्डियों से शंक का निर्माण हुआ, इसलिए शंकर जी की पूजा में शंख का प्रयोग करना वर्जित है

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