चीन में पत्रकारों पर पाबंदियों का असर अमेरिका में चीनी मीडिया की आजादी पर भी पड़ सकता है: अमेरिका

राजगोपालन को उनके 'पुलिस राज्य' पर लिखे लेख के लिए मानवाधिकार प्रेस पुरस्कार, 2018 से सम्मानित किया गया था.

Written by: Roopam Singh
Updated: August 24, 2018, 1:40 PM IST

बीजिंग: चीन में बजफीड न्यूज की ब्यूरो चीफ मेघा राजगोपालन का पत्रकारिता वीजा आवेदन ख़ारिज कर उन्हें चीन सरकार ने देश छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया है. इस पर सख्त रुख अपनाते हुए अमेरिकी दूतावास ने कहा कि वह चीन में विदेशी और घरेलू पत्रकारों के काम पर पाबंदियों को लेकर ‘‘बहुत चिंतित’’ है.

मानवाधिकार प्रेस पुरस्कार, 2018 से हुई थीं सम्मानित
बजफीड न्यूज से जुड़ी राजगोपालन 2012 से एशिया से सम्बन्धित ख़बरें कर रही थीं और हाल में ही उईगुर मुस्लिम बहुल वाले जिंजियान इलाके की खबरों पर प्रमुखता से रिपोर्टिंग कर रहीं थीं. कम्युनिस्ट सरकार द्वारा वीजा आवेदन खारिज करना उनके लेख ‘इक्कीसवीं सदी का पुलिस राज्य कुछ ऐसा दिखता है’ जैसे संवेदनशील माने जाने वाले विषयों पर उनके काम को लेकर सजा के तौर पर देखा जा रहा है.

राजगोपालन को उनके इस लेख के लिए मानवाधिकार प्रेस पुरस्कार, 2018 से सम्मानित किया गया था. उन्होंने अपने लेख में लिखा था था कि इस बढ़ते पुलिस राज्य में आम नागरिकों की पहचान के लिए कैमरे और फिंगरप्रिंट स्कैनिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है.

अमेरिका ने चीनी मीडिया की आजादी छीनने के दिए संकेत
चीन ने राजगोपालन के निष्कासन के पीछे की वजह पर कोई जानकारी नहीं दी और दूतावास के बयान में उनके नाम का जिक्र भी नहीं है. दूतावास ने कहा कि चीन में बेहतर आजादी आवश्यक है क्योंकि इसका परस्पर संबंध अमेरिका में चीनी मीडिया को मिलने वाली आजादी से है.

फोरेन कोरेस्पोंडेंट क्लब ऑफ़ चाइना ने ट्वीट कर राजगोपालन का वीजा आवेदन खारिज होने की पुष्टि की. क्लब की ओर से कहा गया कि, ‘देश में रहते हुए राजगोपालन ने पत्रकारिता के सभी नियमों का पालन किया. चीनी सरकार ने बिना कारण बताए वीजा आवेदन ख़ारिज करने की कोई वजह भी नहीं बताई है, जो कि गलत है.’

लोकतांत्रिक देशों में प्रेस पर पाबन्दी
रिपोर्टर विदआउट बॉर्डर (RSF) के डायरेक्टर सेड्रिक अल्विअनी ने बताया कि, ‘चीन के विदेश मन्त्रालय को अपना निर्णय बदलना चाहिए. विदेशी पत्रकारों को परेशान करने से चीन की छवि नहीं सुधरने वाली. वीजा आवेदन खारिज करने की धमकी के वाक्ये लगातार बढ़ रहे हैं. ये पत्रकारों को दबाने का सबसे आम तरीका है. पन्द्रह प्रतिशत संवाददाताओं ने माना कि खुद को लोकतान्त्रिक कहने वाले देशों में पिछले साल ही उन्हें साल में कम से कम तीन बार धमकाया गया.

Add India.com as a Preferred Source Add India.com as a Preferred Source

ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें. India.Com पर विस्तार से पढ़ें World Hindi की और अन्य ताजा-तरीन खबरें

By clicking “Accept All Cookies”, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts Cookies Policy.