
Gaurav Barar
गौरव बरार (Gaurav Barar) एक अनुभवी पत्रकार और कंटेंट विशेषज्ञ हैं जिनके पास 10 साल से ज्यादा का अनुभव है. वर्तमान में, इंडिया.कॉम में बतौर चीफ सब एडिटर अपनी सेवाएं ... और पढ़ें
Pakistan Bomb Blast: पाकिस्तान के इस्लामाबाद में एक इमामबाड़े पर हुए भीषण हमले ने एक बार फिर पूरी दुनिया को झकझोर दिया है. इस दुखद घटना में 30 से ज्यादा लोगों की जान चली गई. अक्सर लोग इमामबाड़ा और मस्जिद को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से इन दोनों में बड़ा अंतर है.
विशेषकर भारत के लखनऊ जैसे शहरों में इमामबाड़े इतिहास और वास्तुकला का अहम हिस्सा हैं. जानिए इमामबाड़ा असल में क्या होता है, इसका महत्व क्या है और यह मस्जिद से कैसे अलग है.
इमामबाड़ा शिया मुस्लिम समुदाय के लिए एक पवित्र और भावनात्मक स्थान है. ‘इमाम’ और ‘बाड़ा’ (स्थान) को जोड़कर बने इस शब्द का अर्थ है- ‘इमाम का निवास’ या इमाम का घर. मुख्य रूप से यह स्थान पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथियों की कर्बला के मैदान में हुई शहादत को याद करने के लिए बनाया जाता है.
इसे इमामबारगाह या आशूरखाना के नाम से भी जाना जाता है. मुहर्रम के महीने में यहां मातम मनाया जाता है, मजलिस यानी शोक सभाएं होती हैं और नौहा यानी शोक गीत पढ़े जाते हैं.
एक इमामबाड़े की बनावट मस्जिद से काफी अलग होती है. इसकी मुख्य पहचान इसके भीतर का एक विशाल हॉल होता है. इमामबाड़े के भीतर एक ऊंचा चबूतरा या कमरा होता है जिसे शाहनशीं कहा जाता है.
शाहनशीं में इमाम हुसैन के मकबरे के प्रतीकों और उनके झंडे (अलम) को बेहद सम्मान के साथ सजाकर रखा जाता है. इमामबाड़े का उद्देश्य लोगों को इकट्ठा करना और दुख साझा करना होता है, इसलिए यहां बड़े हॉल और खुले आंगन होते हैं.
यह समझना बहुत जरूरी है कि हर इमामबाड़ा मस्जिद नहीं होता और हर मस्जिद इमामबाड़ा नहीं. मस्जिद और इमामबाड़ा दोनों ही इस्लाम में पवित्र स्थान हैं, लेकिन इनके उद्देश्य और उपयोग में गहरा अंतर होता है. जहां मस्जिद मुख्य रूप से अल्लाह की इबादत और दिन में पांच बार नमाज अदा करने के लिए बनाई जाती है, वहीं इमामबाड़ा विशेष रूप से पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन की शहादत पर शोक मनाने और मजलिस आयोजित करने के लिए होता है.
धार्मिक मान्यता की बात करें तो मस्जिद सभी मुस्लिम समुदायों के लिए अनिवार्य प्रार्थना स्थल है, जबकि इमामबाड़ा मुख्य रूप से शिया समुदाय द्वारा संचालित एक शोक स्थल है. इनकी बनावट यानी वास्तुकला में भी अंतर साफ दिखता है.
मस्जिद में आमतौर पर मीनारें और किबला यानी काबा की दिशा की ओर संकेत करने वाले गुंबद होते हैं, जबकि इमामबाड़े में बड़े-बड़े हॉल और शाहनशीं प्रमुख होते हैं. उपयोग के लिहाज से मस्जिद साल के 365 दिन हर वक्त सक्रिय रहती है, वहीं इमामबाड़ा साल भर खुला रहने के बावजूद मुहर्रम और गम शोक के विशेष दिनों में विशेष रूप से सक्रिय और गुलजार रहता है.
जब भी इमामबाड़े का जिक्र आता है, भारत के लखनऊ शहर का नाम सबसे पहले आता है. अवध के नवाबों ने यहां विश्व प्रसिद्ध बड़ा इमामबाड़ा और छोटा इमामबाड़ा बनवाया था. बड़ा इमामबाड़ा अपनी भूलभुलैया के लिए दुनिया भर में मशहूर है. दिलचस्प बात यह है कि इसका मुख्य हॉल बिना किसी खंभे के टिका हुआ है, जो इंजीनियरिंग का एक अद्भुत नमूना है.
लखनऊ के इमामबाड़ों की खासियत यह है कि यहां सिर्फ शिया मुस्लिम ही नहीं, बल्कि हर धर्म और संप्रदाय के लोग आते हैं. यह न सिर्फ धार्मिक केंद्र हैं, बल्कि पर्यटन और इतिहास के लिहाज से भी अनमोल हैं.
पाकिस्तान में इमामबाड़ों को निशाना बनाना अक्सर सांप्रदायिक हिंसा का हिस्सा होता है. वहां अल्पसंख्यक शिया समुदाय लंबे समय से कट्टरपंथी समूहों के निशाने पर रहा है. इमामबाड़े उनके लिए न सिर्फ इबादत की जगह हैं, बल्कि उनकी पहचान का प्रतीक भी हैं, इसीलिए आतंकी अक्सर इन ठिकानों को निशाना बनाते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को नुकसान पहुंचाया जा सके.
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