पेरिस: आतंकवाद पर नकेल कसने में नाकामयाबी पाकिस्‍तान को अब भारी पड़ने वाली है. आतंकी फंडिंग पर नजर रखने वाली एजेंसी फाइनेंशियल एक्‍शन टास्‍क फोर्स ने उसे फिर से ग्रे लिस्‍ट में डालने का फैसला किया है. एजेंसी द्वारा ग्रे लिस्‍ट में रखे गए देशों पर आतंकी फंडिंग को लेकर कड़ी निगरानी रखी जाती है. पाकिस्‍तान की अर्थव्‍यवस्‍था के साथ अमेरिका के साथ उसके संबंधों के लिहाज से भी यह बेहद महत्‍वपूर्ण फैसला है. यह फैसला अफगानिस्‍तान में इस्‍लामिक आतंकी संगठनों के साथ पाकिस्‍तान के संबंधों को कमजोर करने के इरादे से लिया गया है. पाकिस्‍तान के खिलाफ अमेरिका द्वारा पेश किए गए प्रस्‍ताव का भारत, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों ने तो समर्थन किया ही, उसके दोस्‍त चीन ने भी अंतिम समय में प्रस्‍ताव को लेकर अपनी आपत्तियां वापस ले लीं.

एफएटीएफ के इस कदम से पाकिस्‍तान के लिए विदेशी निवेश हासिल करना मुश्किल हो जाएगा. अंतरराष्‍ट्रीय कंपनियां, बैंक तथा अन्‍य वित्‍तीय संस्‍थाएं वहां पैसा लगाने से परहेज कर सकती हैं. पाकिस्‍तान की अर्थव्‍यवस्‍था पहले से ही काफी कमजोर हालत में है. ऐसे में उसके लिए मुश्किलें और भी बढ़ जाएंगी.

एफएटीएफ की पेरिस में हुई बैठक में केवल तुर्की पाकिस्‍तान के समर्थन में खड़ा हुआ. एजेंसी के कुल 37 सदस्‍य हैं. इनमें से 36 देशों ने आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के चलते उसे दंडित करने के प्रस्‍ताव का समर्थन किया.

इससे पहले पिछले बुधवार को पाकिस्‍तान के विदेश मंत्री ख्‍वाजा आसिफ ने दावा किया था कि उसे ग्रे लिस्‍ट में डालने के लिए अमेरिका की अगुवाई में हो रही कोशिशें नाकाम हो गई हैं. आसिफ ने ट्विटर पर दावा किया था कि एजेंसी ने पाकिस्‍तान को तीन महीने की मोहलत दी है. हालांकि, एफएटीएफ के इस फैसले की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन यह स्‍पष्‍ट है कि पाक विदेश मंत्री का यह दावा झूठा था. इससे पहले दंड से बचने के लिए पाकिस्‍तान ने देश के आतंकवाद रोधी कानून में बदलाव के साथ हाफिज सईद के नेतृत्‍व वाले संगठन पर कब्‍जा कर लिया था, लेकिन जल्‍दबाजी में किए गए ये प्रयास काफी साबित नहीं हुए.