जंग की आग में तड़प रहा ईरान, चावल 287% और दूध 139% तक हो गए महंगे, EMI पर आटा खरीद रहे ईरानी
ईरान में महंगाई दर दूसरे विश्व युद्ध के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है. ईरान के केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-मई 2026 के दौरान वार्षिक महंगाई दर 77.2% तक पहुंच गई.
महंगाई का असर सिर्फ उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है. व्यापारियों और दुकानदारों का कहना है कि बाजारों में भीड़ तो दिखाई देती है, लेकिन खरीददार नहीं हैं. (ANI)
अमेरिका और इजरायल ने मिलकर जब 28 फरवरी 2026 को ईरान के खिलाफ जंग छेड़ी थी, तो लोगों को लगा था कि ईरान में सत्ता परिवर्तन की स्थिति बनेगी. जंग कुछ ही दिनों में खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ईरान की इस्लामिक सरकार अभी भी कायम है. हमलों के बीच पीस डील को लेकर बातचीत भी चल ही रही है. ड्रोन और मिसाइल हमलों के साथ-साथ ईरान के सामने एक नई और शायद ज्यादा खतरनाक चुनौती खड़ी हो गई है. ये चुनौती का नाम है आर्थिक तबाही. युद्ध के बाद ईरान में महंगाई, बेरोजगारी, दवा संकट और उत्पादन में गिरावट ने आम लोगों की जिंदगी मुश्किल बना दी है. हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई ईरानी परिवारों के लिए रोटी खरीदना तक मुश्किल हो रहा है.
अल-जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान में महंगाई दर दूसरे विश्व युद्ध के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है. ईरान के केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-मई 2026 के दौरान वार्षिक महंगाई दर 77.2% तक पहुंच गई. कुछ चीजों की कीमतों में 100% से भी ज्यादा इजाफा दर्ज किया गया है.
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आसमान छू रहे खाने-पीने की चीजों के दाम
- युद्ध और आर्थिक संकट के बाद कुकिंग ऑयल की कीमतें 430% तक बढ़ गई हैं. अंडे 345%, चावल 287% और दूध 139% तक महंगा हो चुका है.
- रिपोर्ट के मुताबिक, जंग के बाद महंगाई की सबसे ज्यादा मार खाने-पीने की चीजों पर पड़ी है. कई इलाकों में हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि लोग आटा, राशन, और सुपरमार्केट पैकेज तक EMI में खरीद रहे हैं.
- आम लोगों का कहना है कि अब बाजार जाना सिर्फ कीमतें देखने जैसा रह गया है, क्योंकि खरीदारी की क्षमता तेजी से घट रही है.
लाल मांस खाना अब सपने जैसा
अल जजीरा से बातचीत में तेहरान की रहने वाली बसिया (34) ने कहा, "अब घर में लाल मांस लगभग गायब हो चुका है. चिकन भी कभी-कभार ही बनता है. अंडों को भी गिनकर इस्तेमाल करना पड़ता है." कई पेंशनहोल्डर और नौकरीपेशा लोगों का कहना है कि उनकी कमाई घरेलू खर्च का एक तिहाई हिस्सा भी पूरा नहीं कर पा रही है.
मार्केट का हाल भी खराब
महंगाई का असर सिर्फ उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है. व्यापारियों और दुकानदारों का कहना है कि बाजारों में भीड़ तो दिखाई देती है, लेकिन खरीददार नहीं हैं. लोग दुकानों में आते हैं, कीमतें देखते हैं और खाली हाथ लौट जाते हैं. कई छोटे कारोबारियों का कहना है कि पिछले 40 साल में उन्होंने इतना खराब व्यापारिक माहौल नहीं देखा.
इंडस्ट्रीज हो गई ठप
जंग का असर उद्योगों पर भी पड़ा है. मशहद के पास स्थित कई फैक्ट्रियों में उत्पादन ठप पड़ गया है. कच्चे माल की कमी के कारण कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजा जा रहा है, विशेष रूप से पेट्रोकेमिकल उद्योग को भारी नुकसान पहुंचा है. पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में आई गिरावट का असर खाने-पीने की चीजों, दवाओं, पैकेजिंग और अन्य उपभोक्ता चीजों की कीमतों पर भी पड़ रहा है.
दवाओं की सप्लाई पर भी पड़ा असर
अमेरिका और इजरायल के हमलों ने ईरान के हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को तबाह कर दिया है. इस्फहान के डॉक्टरों के मुताबिक फार्मेसियों में दवाएं अब राशन की तरह दी जा रही हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय ने डॉक्टरों से कहा है कि वे सिर्फ बहुत जरूरी दवाएं ही लिखें. ईरान हीमोफीलिया एसोसिएशन के प्रमुख अमीन अफशार ने चेतावनी दी है कि ब्लिडिंग संबंधी बीमारियों के मरीजों के लिए जरूरी दवाओं का स्टॉक खत्म होने वाला है. नई खेप नहीं पहुंच रही हैं.
ईरान में पहली ही बढ़ी हुई थी महंगाई
इस संकट के लिए सिर्फ युद्ध जिम्मेदार नहीं है. ईरान पहले से ही आर्थिक प्रतिबंधों, भ्रष्टाचार, करेंसी की गिरावट और कमजोर आर्थिक नीतियों से जूझ रहा था. दिसंबर 2025 में बढ़ती महंगाई और करेंसी की गिरती वैल्यू के खिलाफ हजारों लोग सड़कों पर उतर आए थे. विरोध इतना बढ़ा कि केंद्रीय बैंक प्रमुख मोहम्मद रजा फरजिन को इस्तीफा देना पड़ा.
अब ईरान की अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है. रोजगार के मौके कम हो रहे हैं और आम लोगों की क्रय शक्ति तेजी से खत्म हो रही है. अगर हालात नहीं सुधरे, तो ईरान को आने वाले महीनों में एक नए सामाजिक और राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ सकता है.
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