Iran War: मजबूरी, धोखा या समझदारी! ईरान के साथ खुलकर क्यों नहीं आ रहे यमन के हूती?

यमन के हूती विद्रोहियों को ईरान के एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस का हिस्सा माना जाता है. यमन के बड़े हिस्से पर इनका कंट्रोल है और ये हथियार बंद समूह रेड सी से गुजरने वाले जहाजों के लिए मुश्किलें खड़ी करता रहा है.

Published date india.com Published: March 14, 2026 1:49 PM IST
(फोटो क्रेडिट- IANS)
(फोटो क्रेडिट- IANS)

US-Israel vs Iran War: ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद पश्चिम एशिया के हालात खराब हैं. युद्ध में ईरान तो मोर्चे पर डटा हुआ ही है, साथ ही हेजबुल्लाह ने भी लेबनॉन में इजरायल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. ईरान के अन्य क्षेत्रीय सहयोगियों में हमास की ताकत लगभग खत्म हो चुकी है. लेकिन, यमन में बैठे हूती विद्रोही आज भी इतनी ताकत रखते हैं कि अलग मोर्चा खोल कर युद्ध को और भी भीषण बना सकते हैं. हैरानी की बात ये है कि अब तक हूती युद्ध में नहीं उतरा है. कुछ लोग इसे मजबूरी मान रहे हैं तो कुछ समझदारी. आइये जानते हैं कि आखिर क्यों अब तक हूती शांत हैं और इनकी ताकत कितनी है.

कौन हैं हूती?

यमन के हूती विद्रोहियों को ईरान के एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस का हिस्सा माना जाता है. यमन के बड़े हिस्से पर इनका कंट्रोल है और ये हथियार बंद समूह रेड सी से गुजरने वाले जहाजों के लिए मुश्किलें खड़ी करता रहा है. हूतियों के पास मध्यम दूरी की मिसाइलें भी हैं और ये इजरायल तक हमला करने में सक्षम हैं. लंबे समय से हूती विद्रोहियों को ईरान के लिए तुरुप का इक्का माना जाता रहा है. लेकिन, जब ईरान को सहयोगियों की सख्त जरूरत है तब हूती संगठन की चुप्पी सबको खटक रही है.

क्यों ईरान-अमेरिका युद्ध से दूर हैं हूती?

होर्मुज बंद होने का असर दुनिया ने देख लिया है. अब अगर रेड सी का अहम समुद्री रास्ता भी हूती बंद कर दें तो हालात हद से ज्यादा बिगड़ जाएंगे. लेकिन हूती ईरान अमेरिका युद्ध से दूर है. हूती समूह के लीडर अब्दुल मलिक अल हूती ने बयान जारी कर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या की निंदा तो की लेकिन लड़ाकों को जंग में नहीं उतारा. इसका सबसे पहला कारण हूती गुट की महात्वाकांक्षा को बताया जा रहा है.

हूती अब यमन में सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं और राजधानी सना पर इनका नियंत्रण है. इसे कुछ-कुछ अफगानिस्तान पर तालिबान के नियंत्रण की तरह समझिए. हूती अब अपनी पहचान केवल विद्रोही गुट की तरह नहीं बनाना चाहते. इसके अलावा हूतियों का सऊदी अरब के साथ एक शांति समझौता भी हुआ है. जंग में उतरने से अगर क्षेत्रीय शांति बिगड़ी तो हूती समूह को सऊदी अरब से सीधे भिड़ना पड़ेगा. इससे हूती यमन में कमजोर भी पड़ सकते हैं जो वो नहीं चाहते.

सऊदी अरब और हूती समूह के बीच 2022 से ही शांति है. हूती सऊदी के साथ सरकार के लेवल की बात चाहते हैं और अपने ऊपर लगे सारे प्रतिबंध हटवाना चाहते हैं. ऐसे में जंग में उतरना उनके लिए आर्थिक रूप से घाटे का सौदा हो सकता है. एक अन्य कारण ये भी है कि अगर हूती युद्ध में उतरते हैं तो उन पर तीन तरफ से हमले हो सकते हैं. सऊदी अरब भी उन्हें निशाना बना सकता है, अमेरिकी नौसेना भी हमला कर सकती है और इजरायल तो तैयार ही बैठा है. इसलिए हूती नहीं चाहते कि उनका हश्र हेजबुल्लाह जैसा हो.

विचारधारा का अंतर

यमन के हूती भी शिया हैं. शिया मुसलमान होने के कारण इनकी ईरान से नजदीकी तो है लेकिन यह संगठन ईरान के अयातुल्लाह को अपना सर्वोच्च लीडर नहीं मानता. दूसरी तरफ हेजबुल्लाह की बात करें तो वह ईरान के अयातुल्लाह को ही अपना मजहबी रहनुमा मानता है. हूती जैदी शिया समुदाय से संबंध रखते हैं जो केवल यमन के उत्तरी पहाड़ी इलाके में रहते हैं. जैदी शिया पांचवें इमाम जैद-ईब्न-अली को अपना अंतिम प्रमुख ईमाम मानते हैं. माना जाता है कि ईरन से हूती का संबंध समझौते पर टिका है जिसमें ईरान हूती संगठन को हथियार और ट्रेनिंग देता है, बदले में हूती उसके लिए जरूरत पड़ने पर हथियार उठाते हैं.

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