ईरान के पड़ोस में इजरायल ने बनाया था गुप्त सैन्य अड्डा, IRGC को भनक भी नहीं लगी, अब सामने आया भीषण हमलों के पीछे का सच

Written By: Shivendra Rai Updated by: Shivendra Rai
Updated Date:May 10, 2026 10:29 AM IST

इजरायल और ईरान के बीच की दूरी लगभग 1000 मील है. इजरायल ने युद्ध के मैदान के करीब पहुंचने के लिए इस सैन्य अड्डे का निर्माण किया. इस चौकी ने इजरायल को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त प्रदान की.

Iran vs Isreal: इजरायल ने फरवरी 2026 में एक बेहद मुश्किल खुफिया तैयारी के बाद ईरान पर भीषण हवाई हमले किए थे. अब इस हमले से जुड़ी एक रिपोर्ट सामने आई है जिससे पता चलता है कि इजरायल की तैयारी कितनी पुख्ता थी. पता चला है कि ईरान पर हमले के लिए इजरायल ने इराक में एक गुप्त सैन्य ठिकाना तैयार कर लिया था जिसकी भनक किसी को नहीं लगी.

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इजरायल ने हमले से पहले किया किया?

वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान पर हमले से पहले इजरायल ने अपने हवाई अभियान को समर्थन देने के लिए इराकी रेगिस्तान में चुपके से एक गुप्त सैन्य चौकी स्थापित की थी. युद्ध के शुरुआती हफ्तों में इस गुप्त अड्डे के बारे में इराकी फौज को पता चला. जब इराकी सैनिक लगभग इस चौकी तक पहुंचने वाले थे तब इजरायल ने उन पर हवाई हमले किए.

युद्ध शुरू होने से ठीक पहले बनाई गई इस चौकी में इजरायल की स्पेशल फोर्स के जवान तैनात थे. इस खुफिया अड्डे का इस्तेमाल इजरायली वायुसेना के लिए एक लॉजिस्टिक केंद्र के लिए किया गया. रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका को भी इस अड्डे की जानकारी थी.

क्यों बनाई गई इराक में सैन्य चौकी?

इजरायल और ईरान के बीच की दूरी लगभग 1000 मील है. इजरायल ने युद्ध के मैदान के करीब पहुंचने के लिए इस सैन्य अड्डे का निर्माण किया. इस चौकी ने इजरायल को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त प्रदान की. इस खुफिया सैन्य अड्डे पर विशेष रूप से खोज और बचाव दल तैनात किए गए थे. इजरायल किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार था. अगर ईरान की सीमा में कोई लड़ाकू विमान गिर जाता तो तुरंत कार्रवाई के लिए इस अड्डे का इस्तेमाल किया जाना था. रिपोर्ट में बताया गया है कि जब इस्फहान के पास एक अमेरिकी F-15 विमान मार गिराया गया तो इजरायल ने मदद की पेशकश की थी. हालांकि, अमेरिकी सेना ने अपने दो पायलटों को खुद ही बचा लिया. इस अमेरिकी बचाव अभियान के दौरान भी सुरक्षा प्रदान करने में मदद के लिए इजरायल ने हवाई हमले किए थे.

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि पांच हफ्ते तक चले अभियान के दौरान इजरायली वायुसेना की स्पेशल फोर्स इस बेस पर मौजूद रहीं. ये यूनिट दुश्मन के इलाके में कमांडो ऑपरेशन के लिए मशहूर है.

जब इराक की सेना को सच पता चल गया

मार्च की शुरुआत में इस बेस के बारे में इराक की सेना को पता चल गया. एक स्थानीय चरवाहे ने उस इलाके में कुछ असामान्य सैन्य गतिविधियां देखीं. इसके बाद इराकी सेना के अधिकारियों तक ये खबर पहुंच गई. इराकी सेना ने जांच के लिए वहां अपने सैनिक भी भेजे. इराकी सैनिक सुबह-सवेरे जब हमवी (Humvees) गाड़ियों में सवार होकर उस जगह की ओर रवाना हुए तो बेस पर पहुंचने से पहले ही उन पर हवाई हमले शुरू हो गए. इस हमले में एक इराकी सैनिक की मौत भी हुई.

बाद में इराक ने इस जगह के बारे में जानकारी जुटाने के लिए देश की 'आतंकवाद-रोधी सेवा' की दो और टुकड़ियां भेजीं. उन टुकड़ियों को कुछ ऐसे सबूत मिले जिससे साफ हो गया कि कोई सैन्य बल इस जगह पर मौजूद था. इराक की 'संयुक्त अभियान कमान' उप-कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल क़ैस अल-मुहम्मदावी ने भी इस सच के स्वीकार किया. हालांकि जब तक ईरान और इराक को इसके बारे में पता चलता, तब तक इजरायल अपने मिशन को अंजाम दे चुका था जिसमें सर्वोच्च नेता अली खामेनेई भी मारे गए थे.

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