
Gaurav Barar
गौरव बरार (Gaurav Barar) एक अनुभवी पत्रकार और कंटेंट विशेषज्ञ हैं जिनके पास 10 साल से ज्यादा का अनुभव है. वर्तमान में, इंडिया.कॉम में बतौर चीफ सब एडिटर अपनी सेवाएं ... और पढ़ें
Israel Iran War: पिछले कुछ दिनों में मिडिल ईस्ट की तस्वीरों ने पूरी दुनिया को दहला दिया है. अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान की शीर्ष लीडरशिप, जिसमें उनके सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई भी शामिल थे, के खत्म होने की खबरें आई. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि शीर्ष नेतृत्व के न होने के बावजूद ईरान इतनी आक्रामकता से पलटवार कैसे कर रहा है?
ईरान ने आज की परिस्थितियों के लिए खुद को पिछले चार दशकों से तैयार किया है. जेरूसलम पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान अब तक अपने दुश्मनों पर 1,481 मिसाइलें और कॉम्बैट ड्रोन दाग चुका है. इसमें से सबसे ज्यादा हमले इजरायल, यूएई और कुवैत पर हुए हैं.
हैरानी की बात यह है कि ईरान ने इराक और जॉर्डन जैसे मुस्लिम देशों को भी नहीं बख्शा है. अब यह युद्ध केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ईरान के ड्रोन अब साइप्रस स्थित ब्रिटिश एयरबेस तक पहुंच चुके हैं. इसने युद्ध की आग को यूरोप के दरवाजे तक पहुंचा दिया है.
इस युद्ध में अब ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों ने भी अपनी सीधी एंट्री मार ली है. इन तीनों देशों ने एक साझा बयान जारी कर अमेरिका का साथ देने की घोषणा की है. उनका कहना है कि ईरान ने उन देशों पर हमला करके बड़ी गलती की है जो इस सैन्य कार्रवाई में शामिल भी नहीं थे. अब स्थिति यह है कि ईरान के खिलाफ 15 देशों का एक मजबूत गठबंधन खड़ा हो गया है, जिससे इस युद्ध को रोकना अब लगभग असंभव सा लग रहा है.
मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा देश, सऊदी अरब, इस युद्ध में एक अजीब रणनीति अपना रहा है. कहा जा रहा है कि इजरायल के बाद सबसे ज्यादा मिसाइलें सऊदी अरब पर गिरी हैं, लेकिन वहां की सरकार इन हमलों को छिपा रही है. सऊदी अरब, कतर और बहरीन ने सख्त निर्देश जारी किए हैं कि कोई भी नागरिक हमलों के वीडियो सोशल मीडिया पर न डाले.
इसका मुख्य कारण इन देशों की सुरक्षित पर्यटन स्थल वाली छवि को बचाना है. दुबई और अबू धाबी जैसे शहर भारतीयों के पसंदीदा वेकेशन स्पॉट हैं. साल 2024 में करीब 77 लाख भारतीय यूएई और 34 लाख सऊदी अरब गए थे. अब इन पर्यटकों की सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है. हाल ही में ईरान ने सऊदी की दिग्गज तेल कंपनी अरामको की रिफाइनरी को भी निशाना बनाया.
दुनिया हैरान है कि नेतृत्व खत्म होने के बाद भी ईरान की सेना (IRGC) इतनी संगठित कैसे है? इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं. पहला ईरान ने अपनी मिसाइलों को खुले मैदानों के बजाय जाग्रोस पर्वतमाला की पहाड़ियों के नीचे छिपाया है.
उन्होंने चट्टानों को काटकर जमीन के नीचे पूरे शहर बसा दिए हैं, जिन्हें मिसाइल सिटी कहा जाता है. इन सुरंगों को सैटेलाइट से ढूंढना नामुमकिन है. ईरान मोबाइल लॉन्चर्स का इस्तेमाल करता है. ट्रक पर मिसाइल लादकर बाहर लाते हैं, हमला करते हैं और फिर सुरंग में छिपा देते हैं.
दूसरा कारण है ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC). जिसे 1979 में इसी मकसद से बनाया गया था कि अगर देश का नेतृत्व खत्म हो जाए, तब भी सेना लड़ती रहे. इस फोर्स का हर सिपाही खुद में एक कमांडर की तरह प्रशिक्षित है, जो बिना ऊपर के आदेश के भी युद्ध जारी रख सकता है.
ईरान के पास इतनी मिसाइलें कहां से आईं? इसका जवाब 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध में छिपा है. उस समय उत्तर कोरिया ने ईरान की मदद की थी. दोनों के बीच एक डील हुई थी- ईरान तेल देगा और उत्तर कोरिया मिसाइल तकनीक. इसी तकनीक के दम पर आज ईरान के पास ऐसी मिसाइलें हैं जो आधे यूरोप को निशाना बना सकती हैं.
एक तरफ ईरान युद्ध लड़ रहा है, तो दूसरी तरफ उसकी 38% आबादी गरीबी रेखा के नीचे जी रही है. ईरान ने अपनी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा लोगों की भलाई के बजाय हथियारों पर खर्च किया है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज यानी समुद्री व्यापार मार्ग को बंद कर दिया, तो कच्चे तेल की कीमतें 75 डॉलर से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं. इससे पूरी दुनिया में महंगाई का एक नया तूफान आ जाएगा.
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