
Gargi Santosh
गार्गी संतोष, जी मीडिया के India.com में सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. वह हाइपरलोकल, नेशनल और वर्ल्ड सेक्शन की जिम्मेदारी संभाल रही हैं. गार्गी को लाइफस्टाइल, हेल्थ, टेक्नोलॉजी, और ... और पढ़ें
2030 में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) जब अपनी आखिरी यात्रा पूरी करके पृथ्वी पर वापस लौटेगा, तो करीब तीन दशकों के शांतिपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सहयोग खत्म होगा. ISS ने अंतरिक्ष को आम लोगों की जिंदगी से जोड़ा और विज्ञान की दुनिया में एक नई क्रांति लेकर आई. नवंबर, 2000 से लेकर आज तक फुटबॉल मैदान के आकार की यह दुनिया इंसानों से भरी रही है. यह स्टेशन पृथ्वी की परिक्रमा लगभग 8 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से कर रहा है. अब जब नया चालक दल अगले सप्ताह ISS के लिए रवाना होने वाला है, तो इस मिशन को जमीन से संभालने वाले विशेषज्ञ भी इसके भविष्य को लेकर भावुक हैं, क्योंकि ISS का अंत उनके लिए एक युग के खत्म होने जैसा है.
NASA के साइंस एंड मिशन सिस्टम ऑफिस के पूर्व प्रबंधक जॉन होरैक ने ISS को इंसानों के सहयोग का कैथेड्रल यानी भव्य मंदिर बताया है. उनके मुताबिक, यह स्टेशन इस बात का सबूत है कि अलग-अलग देश, भाषाएं और संस्कृतियां मिलकर भी कुछ बड़ा बना सकते हैं. ISS का प्रस्ताव शीत युद्ध के बाद आया था, जब अमेरिका और रूस जैसे पुराने प्रतिद्वंद्वियों ने साथ काम करने का फैसला किया. यह सहयोग एक नई सोच का प्रतीक बना. खास बात यह है कि आज यूक्रेन युद्ध के कारण रूस और पश्चिमी देशों के रिश्ते भले ही बिगड़ चुके हों. लेकिन ISS पर यह साझेदारी अब भी जारी है, जो इसे दुनिया के लिए एक अनोखी मिसाल बनाती है.
समय के साथ ISS पुराना हो चुका है और इसके कई उपकरण भी अपनी उम्र पूरी कर रहे हैं. इसी वजह से NASA ने पिछले साल घोषणा की कि उसने एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स को एक खास वाहन बनाने के लिए चुना है, जो 2030 में ISS को पृथ्वी के वायुमंडल में वापस धकेलेगा. इस प्रक्रिया में एक बड़ा रॉकेट इंजन स्टेशन की गति धीमी करेगा, ताकि वह सुरक्षित तरीके से री-एंट्री कर सके. ISS को प्रशांत महासागर के उस हिस्से में गिराया जाएगा जहां कोई इंसान नहीं रहता, जिसे पॉइंट नेमो कहा जाता है. यह पृथ्वी पर वह समुद्री क्षेत्र है, जो जमीन से सबसे ज्यादा दूर है. इससे पहले रूस के मीर स्टेशन सहित कई अंतरिक्ष मलबे भी इसी जगह पर गिराए जा चुके हैं.
ISS के खत्म होने के बाद, पृथ्वी की कक्षा में एकमात्र सक्रिय स्टेशन चीन का तियांगोंग रह जाएगा. ऐसे में अमेरिका अब भविष्य को लेकर निजी कंपनियों के स्पेस स्टेशन मॉडल पर ध्यान दे रहा है. माना जा रहा है कि आने वाले समय में स्पेस स्टेशन भी उसी व्यावसायिक मॉडल पर चलेंगे, जैसे आज रॉकेट और सैटेलाइट मिशन चलते हैं. जेफ बेजोस की ब्लू ओरिजिन और एक्सिओम स्पेस जैसी कंपनियां पहले से ही निजी स्पेस स्टेशन बनाने पर काम कर रही हैं. वहीं फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी CNES के लियोनेल सुचेट का कहना है कि भले ही निजी कंपनियां आगे आएं. लेकिन सरकारें हमेशा अपने अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने में रुचि रखेंगी.
ISS के अंत को विशेषज्ञ एक नए युग की शुरुआत मान रहे हैं, क्योंकि अब दुनिया का फोकस चंद्रमा पर बेस बनाने की तरफ बढ़ रहा है. जिसमें अमेरिका और चीन दोनों आगे निकलने की दौड़ में हैं. इसी बीच भारत भी तेजी से अपनी तैयारी कर रहा है. ISRO ने 2035 तक अपना खुद का अंतरिक्ष स्टेशन बनाने का लक्ष्य तय किया है.
योजना के मुताबिक, 2028 तक स्टेशन का पहला मॉड्यूल BAS-1 लॉन्च किया जाएगा, जो तकनीकी परीक्षण के लिए होगा. शुरुआत में यह ISS से छोटा होगा और करीब 20-25 टन का रहेगा. इसमें 2 से 4 अंतरिक्ष यात्री रह सकेंगे और 15-20 दिन तक रिसर्च कर पाएंगे. यह स्टेशन पृथ्वी की निचली कक्षा में लगभग 400 किमी ऊंचाई पर स्थापित होगा.
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