जापान ने कर दिखाया कमाल, वैज्ञानिकों ने लैब में बना डाली ये चमत्कारी चीज, पेट्रोल-डीजल ​की टेंशन हो जाएगी फुर्र​

जापान के वैज्ञानिकों ने लोहे और UV लाइट से सस्ती हाइड्रोजन बनाने की नई तकनीक खोज निकाली है. जानिए कैसे यह खोज पेट्रोल-डीजल की टेंशन खत्म करेगी.

Published date india.com Published: April 17, 2026 11:31 PM IST
जापान ने कर दिखाया कमाल, वैज्ञानिकों ने लैब में बना डाली ये चमत्कारी चीज, पेट्रोल-डीजल ​की टेंशन हो जाएगी फुर्र​
Photo from Freepik

जापान की क्यूशू विश्वविद्यालय (Kyushu University) की एक टीम सस्ते कैटलिस्ट बनाने पर रिसर्च कर रही थी. इसी दौरान, एक एक्सपेरिमेंट करते हुए उन्होंने मेथेनॉल, आयरन आयन और सोडियम हाइड्रोक्साइड को मिलाकर उस पर अल्ट्रावायलेट लाइट डाली. नतीजा यह निकला कि इस मिश्रण से बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन गैस पैदा हुई. शुरुआत में खुद वैज्ञानिकों को भी इस पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने इसे इत्तेफाक बताया, जिसने नई दिशा दिखा दी.

क्यों खास है यह एक्सपेरिमेंट?

आपको बता दें ज्यादातर हाइड्रोजन जीवाश्म ईंधन से बनाई जाती है, जिससे पर्यावरण को नुकसान होता है. वहीं, दूसरी विधियों में महंगे और दुर्लभ मेटल्स की जरूरत पड़ती है. लेकिन इस एक्सपेरिमेंट में एक साधारण लोहा इस्तेमाल हुआ, जो सस्ता भी होता और आसानी से मिल भी जाता है. खास बात यह है कि इस एक्सपेरिमेंट से हाइड्रोजन उत्पादन की रफ्तार भी महंगे कैटलिस्ट जितनी ही तेज पाई गई, जो इसे और ज्यादा उपयोगी बनाती है. इससे साफ होता है कि कम लागत में भी बेहतर परिणाम मिल सकते हैं.

कई चीजों से निकली हाइड्रोजन गैस

इस रिसर्च की सबसे बड़ी खासियत थी – इसकी वर्सेटिलिटी. वैज्ञानिकों ने पाया कि यह तकनीक सिर्फ मेथेनॉल तक सीमित नहीं है, बल्कि एथेनॉल और प्रोपेनॉल जैसे अन्य अल्कोहल से भी हाइड्रोजन निकाली जा सकती है. इतना ही नहीं, ग्लूकोज, स्टार्च और सेल्युलोज जैसे बायोमास से भी हाइड्रोजन बनाने में सफलता मिली है. हालांकि, कुछ मामलों में इसकी क्षमता थोड़ी कम है. लेकिन इसे बेहतर बनाने की पूरी संभावना है.

भविष्य में इसे क्या फायदा होगा?

हाइड्रोजन ईंधन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती. अगर इस नई और सस्ती तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया गया, तो हाइड्रोजन से चलने वाले वाहन और पावर प्लांट काफी सस्ते हो सकते हैं. हालांकि, अभी इस प्रक्रिया के मैकेनिज्म को पूरी तरह समझना बाकी है और इसकी एफिशिएंसी बढ़ाने की जरूरत है. लेकिन यह खोज एक मजबूत शुरुआत मानी जा रही है. आने वाले समय में यह तकनीक फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता कम कर, पर्यावरण को बचाने में मदद करेगी.

Also Read:

ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें. India.Com पर विस्तार से पढ़ें World Hindi की और अन्य ताजा-तरीन खबरें

By clicking “Accept All Cookies”, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts Cookies Policy.