
Gargi Santosh
गार्गी संतोष Zee Media के India.com में सब-एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं. वह हाइपरलोकल, नेशनल और वर्ल्ड न्यूज सेक्शन संभालती हैं. गार्गी को लाइफस्टाइल, स्पोर्ट्स और वायरल ... और पढ़ें
जापान की क्यूशू विश्वविद्यालय (Kyushu University) की एक टीम सस्ते कैटलिस्ट बनाने पर रिसर्च कर रही थी. इसी दौरान, एक एक्सपेरिमेंट करते हुए उन्होंने मेथेनॉल, आयरन आयन और सोडियम हाइड्रोक्साइड को मिलाकर उस पर अल्ट्रावायलेट लाइट डाली. नतीजा यह निकला कि इस मिश्रण से बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन गैस पैदा हुई. शुरुआत में खुद वैज्ञानिकों को भी इस पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने इसे इत्तेफाक बताया, जिसने नई दिशा दिखा दी.
आपको बता दें ज्यादातर हाइड्रोजन जीवाश्म ईंधन से बनाई जाती है, जिससे पर्यावरण को नुकसान होता है. वहीं, दूसरी विधियों में महंगे और दुर्लभ मेटल्स की जरूरत पड़ती है. लेकिन इस एक्सपेरिमेंट में एक साधारण लोहा इस्तेमाल हुआ, जो सस्ता भी होता और आसानी से मिल भी जाता है. खास बात यह है कि इस एक्सपेरिमेंट से हाइड्रोजन उत्पादन की रफ्तार भी महंगे कैटलिस्ट जितनी ही तेज पाई गई, जो इसे और ज्यादा उपयोगी बनाती है. इससे साफ होता है कि कम लागत में भी बेहतर परिणाम मिल सकते हैं.
इस रिसर्च की सबसे बड़ी खासियत थी – इसकी वर्सेटिलिटी. वैज्ञानिकों ने पाया कि यह तकनीक सिर्फ मेथेनॉल तक सीमित नहीं है, बल्कि एथेनॉल और प्रोपेनॉल जैसे अन्य अल्कोहल से भी हाइड्रोजन निकाली जा सकती है. इतना ही नहीं, ग्लूकोज, स्टार्च और सेल्युलोज जैसे बायोमास से भी हाइड्रोजन बनाने में सफलता मिली है. हालांकि, कुछ मामलों में इसकी क्षमता थोड़ी कम है. लेकिन इसे बेहतर बनाने की पूरी संभावना है.
हाइड्रोजन ईंधन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती. अगर इस नई और सस्ती तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया गया, तो हाइड्रोजन से चलने वाले वाहन और पावर प्लांट काफी सस्ते हो सकते हैं. हालांकि, अभी इस प्रक्रिया के मैकेनिज्म को पूरी तरह समझना बाकी है और इसकी एफिशिएंसी बढ़ाने की जरूरत है. लेकिन यह खोज एक मजबूत शुरुआत मानी जा रही है. आने वाले समय में यह तकनीक फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता कम कर, पर्यावरण को बचाने में मदद करेगी.
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