नई दिल्लीः मालदीव के राजनीतिक संकट पर चीन और भारत दोनों की निगाहें टिकी हुई हैं. मालदीव सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच तनाव की वजह से यह संकट पैदा हुआ है. मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने से इनकार करते हुए आपातकाल की घोषणा कर रखी है. सुप्रीम कोर्ट ने मालदीव के राजनीतिक संकट के हल के लिए भारत से मदद मांगी है. वहीं पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने भी भारत से सैन्य  हस्तक्षेप की मांग की है. दूसरी ओर चीन का कहना है कि भारत को मालदीव के आंतरिक मामले में दखल नहीं देना चाहिए. Also Read - खुलेगा बातचीत का रास्ता! भारत-पाकिस्तान ने संघर्षविराम समझौतों का पालन करने पर जताई सहमति

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मालदीव के बहाने एक बार फिर दोनों देशों के बीच टकराव देखने को मिल सकता है. हिंद महासागर में स्थित मालदीव द्वीप समूह में 1200 कोरल द्वीप शामिल हैं जो प्रमुख शिपिंग लेन के बगल में स्थित हैं. ये चीन, जापान व भारत जैसे देशों को ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं. अंतरराष्ट्रीय  भू-राजनीति के केंद्र में स्थित मालदीव में चीन ने 10 साल पहले ही हिंद महासागर के लिए नौसैनिक जहाजों को भेजना शुरू कर दिया था.  पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद की एमडीपी समेत विपक्ष का समर्थन करने वाली मालदीव की बड़ी आबादी चाहती है कि भारत इस संकट में अपने पड़ोसी देश की मदद करे और यामीन के खिलाफ कार्रवाई करे.

चीन सबसे बड़ा मददगार

मालदीव में चीन की बड़ी आर्थिक मौजूदगी भी भारत के लिए चिंता की बात है. मालदीव को बाहरी मदद का 70 प्रतिशत हिस्सा अकेले चीन से मिलता है. एक्सपर्ट का मानना है कि मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन कुछ वैसा ही कर रहे हैं जैसा श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने किया था. ऐसे में इस राजनीतिक संकट पर भारत को चकौन्ना रहने की जरूरत है. मालदीव सार्क का भी सदस्य देश  है. ऐसे में इस इलाके में भारत को अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए मालदीव को अपने साथ रखना जरूरी है.

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मालदीव में कट्टरपंथ बढ़ा रहा भारत की चिंता

पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा उड़ी में किए गए आतंकी हमले के बाद  पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन का भारत द्वारा बहिष्कार करने के आह्वन पर मालदीव एकमात्र ऐसा देश था जिसने इस आह्वान पर अनिच्छा जताई थी. यामीन के शासनकाल में मालदीव में कट्टरपंथ तेजी से बढ़ रहा है. ऐसा अक्सर कहा जाता है कि सीरिया में लड़ाई के लिए मालदीव से कई लड़ाके गए थे. अपने पड़ोसी देश में कट्टरपंथ का बढ़ना भारत के लिए चिंता की बात है.

मालदीव से रिश्ता है पुराना

मालदीव के साथ भारत के सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंध हैं. मालदीव के साथ नई दिल्ली का धार्मिक, भाषाई, सांस्कृतिक और व्यावसायिक संबंध है. 1965 में आजादी के बाद मालदीव को सबसे पहले मान्यता देने  वाले देशों में भारत शामिल था. बाद में भारत ने 1972 में मालदीव में अपना दूतावास भी खोला. मालदीव में करीब 25 हजार भारतीय रह रहे हैं. हर साल मालदीव जाने वाले विदेशी पर्यटकों में 6 फीसदी भारतीय होते हैं. मालदीव के लोगों के लिए शिक्षा, चिकित्सा और व्यापार के लिहाज से भारत एक पसंदीदा देश है. विदेश मंत्रालय के अनुसार मालदीव के नागरिकों द्वारा उच्च शिक्षा और इलाज के लिए लॉन्ग टर्म वीजा की मांग बढ़ती जा रही है.