नेपाल में एक बार फिर सियासी संकट गहरा गया है, जब राष्‍ट्रपति (President) बिद्या देवी भंडारी (President Bidya Devi Bhandari) ने विपक्षी दलों के बहुमत के दावे को खारिज करते हुए संसद को भंग कर दिया है. नेपाल में कोविड-19 के बढ़ते संकट के बीच राष्‍ट्रपति भंडारी ने मध्‍यवर्ती चुनाव की नई तारीख नवंबर के मध्‍य में कराने की घोषणा की है.Also Read - Aaj Ka Itihas 28 May: आज के दिन नेपाल में खत्‍म हुई 240 सालों से चली आ रही राजशाही

“राष्ट्रपति ने प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया है और पहले चरण का आम चुनाव 12 नवंबर को और दूसरे चरण का 19 नवंबर को कराने का आदेश दिया है. यह एक राष्ट्रपति
आधी रात के बाद जारी बयान में कहा गया है. Also Read - दुनिया के सबसे छोटे टीनएजर हैं Dor Bahadur Khapangi, गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ नाम

नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने शुक्रवार आधी रात को संसद भंग कर दी और 12 तथा 19 नवंबर को मध्यावधि चुनाव कराने की घोषणा की. भंडारी ने यह घोषणा संसद भंग करने की प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली की सिफारिश का समर्थन करने के बाद की. राष्ट्रपति कार्यालय से प्रेस को जारी एक बयान में कहा गया है कि संसद को भंग कर दिया गया है और नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 76 (7) के आधार पर मध्यावधि चुनावों की तारीखों की घोषणा की गई है. Also Read - बुद्ध जयंती पर लुंबिनी पहुंचे PM मोदी, माया देवी मंदिर में की पूजा अर्चना | Watch Video

मंत्री परिषद ने पहले चरण का चुनाव 12 नवंबर और दूसरे चरण का चुनाव 19 नवंबर को कराने की सिफारिश की. नेपाल के राजनीतिक संकट ने शुक्रवार को उस वक्त नाटकीय मोड़ ले लिया जब प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और विपक्षी दलों दोनों ने ही राष्ट्रपति को सांसदों के हस्ताक्षर वाले पत्र सौंपकर नई सरकार बनाने का दावा पेश किया. यह कदम तब उठाया गया जब इससे पहले राष्ट्रपति कार्यालय के एक नोटिस में कहा गया कि वह न तो वह पदस्थ प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और न ही नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा को नियुक्त कर सकता है. दोनों ने ही सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन होने का दावा किया था.

संसद में कम से कम 136 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता  थी
प्रतिनिधि सभा के 275 सदस्यों में से चार सांसदों के दूसरी पार्टी में जाने पर उनकी पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया था. प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को नयी सरकार बनाने के लिए संसद में कम से कम 136 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है.

यह दूसरी बार है जब राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री ओली की सिफारिश पर संसद भंग की है
नेपाली मीडिया की खबरों के अनुसार, दिलचस्प है कि ओली और देउबा दोनों ने ऐसे कुछ सांसदों का समर्थन होने का दावा किया था जिनके नाम उन दोनों की सूची में शामिल थे. यह दूसरी बार है जब राष्ट्रपति भंडारी ने राजनीतिक संकट के बाद प्रधानमंत्री ओली की सिफारिश पर संसद भंग की है. पिछले साल 20 दिसंबर को भी भंडारी ने संसद भंग की थी लेकिन बाद में फरवरी में उच्चतम न्यायालय ने इसे फिर से बहाल कर दिया था.

दोनों पक्षों ने सरकार बनाने का दावा क‍िया था 
नेपाल के राजनीतिक संकट में शुक्रवार को उस वक्त नाटकीय मोड़ आ गया जब प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली और विपक्षी दलों दोनों ने ही राष्ट्रपति को सांसदों के हस्ताक्षर वाले पत्र सौंपकर नई सरकार बनाने का दावा पेश किया. प्रधानमंत्री ओली विपक्षी दलों के नेताओं से कुछ मिनट पहले राष्ट्रपति के कार्यालय शीतल निवास पहुंचे और अपनी सूची सौंपी. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 76 (5) के अनुसार पुन: प्रधानमंत्री बनने के लिए अपनी पार्टी सीपीएन-यूएमएल के 121 सदस्यों और जनता समाजवादी पार्टी-नेपाल (जेएसपी-एन) के 32 सांसदों के समर्थन के दावे वाला पत्र सौंपा. ओली ने संसद में अपनी सरकार का बहुमत साबित करने के लिए एक और बार शक्ति परीक्षण से गुजरने में बृहस्पतिवार को अनिच्छा व्यक्त की थी. ओली ने जो पत्र सौंपा, उसमें जनता समाजवादी पार्टी-नेपाल के अध्यक्ष महंत ठाकुर और पार्टी के संसदीय दल के नेता राजेंद्र महतो के हस्ताक्षर थे. इसी तरह नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा ने 149 सांसदों का समर्थन होने का दावा किया. देउबा प्रधानमंत्री पद का दावा पेश करने के लिए विपक्षी दलों के नेताओं के साथ राष्ट्रपति के कार्यालय पहुंचे.

एक नया विवाद  खड़ा हो गया
‘द हिमालयन टाइम्स’ की खबर के अनुसार राष्ट्रपति ने विपक्षी नेताओं से कहा कि वह संवैधानिक विशेषज्ञों से परामर्श लेने के बाद इस पर फैसला लेंगी. बहरहाल, एक नया विवाद तब खड़ा हो गया, जब माधव नेपाल धड़े के कुछ सांसदों ने यह दावा करते हुए बयान दिया कि उनके हस्ताक्षरों का दुरुपयोग किया गया है और उन्होंने विपक्षी नेता देउबा को उनकी अपनी पार्टी के प्रमुख के खिलाफ प्रधानमंत्री के तौर पर नियुक्त करने के किसी पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं.

प्रधानमंत्री ओली और राष्ट्रपति भंडारी की आलोचना 
मध्यावधि चुनाव की घोषणा होने के तुरंत बाद बड़े राजनीतिक दलों ने प्रधानमंत्री ओली और राष्ट्रपति भंडारी की उनके ”असंवैधानिक” कदमों के लिए आलोचना की. नेपाली कांग्रेस के प्रवक्ता विश्व प्रकाश शर्मा ने कहा, ”लोग महामारी से लड़ रहे हैं और यह लोगों को तोहफा है? प्रधानमंत्री तानाशाही के अपने काल्पनिक रास्ते पर चल रहे हैं. सामूहिक रूप से संविधान का शोषण महंगा साबित होगा.”

यह आधी रात को हुई लूट: माओइस्ट सेंटर
माओइस्ट सेंटर के नेता वर्षा मान पुन ने कहा, ‘यह आधी रात को हुई लूट है. ज्ञानेंद्र शाह ऐसे कदमों के लिए शुक्रवार और आधी रात को चुनते थे. केपी ओली उन लोगों के लिए कठपुतली हैं, जो हमारे संविधान को पसंद नहीं करते और यह लोकतंत्र तथा हमारे संविधान पर हमला है.”

शेखर कोइराला ने इस कदम को असंवैधानिक बताया
वरिष्ठ नेपाली कांग्रेस नेता शेखर कोइराला ने इस कदम को असंवैधानिक बताया. अन्य नेपाली कांग्रेस नेता रमेश लेखक ने ट्वीट किया कि राष्ट्रपति अपना कर्तव्य भूल गई हैं और उन्होंने संविधान को रौंद डाला. वह लोकतंत्र की रक्षा नहीं कर सकतीं. देश में यह नया राजनीतिक संकट ऐसे समय में पैदा हुआ है जब कोरोना वायरस पैर पसार रहा है.