कोलंबो: श्रीलंका में पद से हटाए गए प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के गठबंधन ने शुक्रवार को संसद में शक्तिशाली समिति पर नियंत्रण पा लिया, जिसे राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना और उनके मनोनीत प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के लिये करारा झटका माना जा रहा है. सिरिसेना की पार्टी के सदस्यों ने युनाइटेड पीपुल्स फ्रीडम अलायंस (यूपीएफए) के पांच सदस्यों को नियुक्त करने के स्पीकर कारू जयसूर्या के कदम के खिलाफ संसद से बहिर्गमन किया. Also Read - श्रीलंका का सियासी संकट: राजपक्षे ने प्रधानमंत्री पद से दिया इस्तीफा, विक्रमसिंघे कल लेंगे शपथ

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सोमवार को स्थगित संसद का सत्र शुक्रवार को फिर शुरू हुआ था. स्पीकर ने विक्रमसिंघे के युनाइटेड नेशनल फ्रंट (यूएनएफ) के पांच सदस्यों और तमिल नेशनल अलायंस (टीएनए) और जनता विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) के एक-एक सदस्य को नामित किया. यह देश में 26 अक्टूबर से शुरू हुए सियासी घमासान के आगे की कड़ी है. खास बात यह है कि विक्रमसिंघे और राजपक्षे दोनों ही खुद के प्रधानमंत्री होने का दावा करते हैं. विक्रमसिंघे ने कहा कि उनको हटाया जाना अवैध है क्योंकि 225 सदस्यों वाली संसद में उनके पास अब भी बहुमत है.

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जयसूर्या ने सत्र की शुरुआत में घोषणा की कि सभी दलों के नेताओं के साथ बैठक के बाद उन्होंने फैसला किया है कि वह यूपीएफए और यूएनएफ को पांच-पांच सीट देंगे. यह बैठक समिति के संयोजन पर बिना किसी फैसले के खत्म हो गई थी. उन्होंने कहा कि समिति में 12 सदस्य होंगे. वरिष्ठ यूपीएफए सदस्य दिनेश गुनावर्धने ने स्पीकर के रवैये को पक्षपातपूर्ण बताकर उसकी आलोचना की. उन्होंने कहा, ‘मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि हमें सरकार के तौर पर मान्यता देकर प्रवर समिति में बहुमत दें. हमारे पास पूर्व की ऐसी नजीर है जब अल्पमत सरकार तक को प्रवर समिति में बहुमत दिया गया.’