पृथ्वी पर 820 करोड़ से भी ज्यादा है आबादी, गांवों में रहने वाले अरबों लोगों की कभी हुई ही नहीं गिनती, चौंकाती है ये स्टडी
दुनिया में इस समय इंसानों की आबादी करीब 8.2 बिलियन (820 करोड़) है. ऐसा अनुमान लगाया गया है कि साल 2080 के मध्य तक ये गिनती 10 बिलियन (1 हजार करोड़) तक पहुंच जाएगी. लेकिन, हालिया स्टडी में दुनिया की आबादी को लेकर नए दावे किए गए हैं.
पृथ्वी की लगभग तीन चौथाई (74%) आबादी ऐसे देशों में रहती है, जहां प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर के बराबर या उससे कम है.
भारत इस समय दुनिया में सबसे आबादी वाला देश है. जबकि, वेटिकन सिटी (Vatican City) दुनिया का सबसे कम आबादी वाला और क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे छोटा देश है. इस बीच धरती पर इंसानों की कितनी आबादी है, इसे लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. नेचर कम्युनिकेशन जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी में दावा किया गया है कि वैश्विक जनसंख्या की गिनती कम की गई है. गांवों में रहने वाले अरबों लोगों को इसमें शामिल नहीं किया गया है.
संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक, दुनिया में इस समय इंसानों की आबादी करीब 8.2 बिलियन (820 करोड़) है. ऐसा अनुमान लगाया गया है कि साल 2080 के मध्य तक ये गिनती 10 बिलियन (1 हजार करोड़) तक पहुंच जाएगी. वहीं, फिनलैंड में आल्टो यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ने पाया कि इन अनुमानों में ग्रामीण आबादी के आंकड़े को अंडरकाउंट किया गया है. 1975 से 2010 के बीच ये आंकड़े 53 से 84 प्रतिशत तक हो सकते हैं.
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35 देशों के डैम प्रोजेक्ट का किया गया एनालिसिस
आल्टो यूनिवर्सिटी की स्टडी के मुताबिक, 35 देशों के डैम प्रोजेक्ट के आंकड़ों का एनालिसिस किया गया. इससे पता चला कि ग्रामीण इलाकों में लोगों की संख्या को कम बताया गया है, जो नीतिगत निर्णयों को प्रभावित कर सकता है. इस रिसर्च में 35 देशों में फैले 300 रूरल डैम प्रोजेक्ट का एनालिसिस करने के लिए 1975 और 2010 के बीच डेटा इकट्ठा किया गया था.रिसर्चर्स का दावा है कि विश्व स्तर पर इस्तेमाल किए जाने वाले जनसंख्या डेटासेट में ग्रामीण आबादी के प्रतिनिधित्व में भारी अंतर हो सकता है.
डेटासेट का नहीं हुआ मूल्यांकन
रिसर्च स्टडी में कहा गया, "हमें यह जानकर हैरानी हुई कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली वास्तविक आबादी वैश्विक जनसंख्या आंकड़ों से कहीं अधिक है. क्योंकि, इन डेटासेट का इस्तेमाल हजारों स्टडी में किया गया है. फिर भी इनकी सटीकता का व्यवस्थित रूप से मूल्यांकन नहीं किया गया है.”
हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट ने जताई आपत्ति
हालांकि, इस रिसर्च से हर कोई सहमत नहीं है. हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के साइंटिस्ट स्टुअर्ट गिटेल-बास्टेन ने 'न्यू साइंटिस्ट' नाम की साइंस मैगजीन को बताया कि ग्रामीण आबादी के आंकड़ों को इकट्ठा करने में अधिक निवेश करना फायदेमंद होगा. पृथ्वी पर हमारी सोच से कुछ अरब अधिक मानव निवासी हो सकते हैं, ये बेहद असंभव है. उन्होंने कहा, “अगर हम वास्तव में इतनी बड़ी संख्या में कम गिनती कर रहे हैं, तो यह एक बहुत बड़ी खबर होगी. ये हजारों अन्य डेटासेट के सालों के नतीजों के विपरीत होगी.”
स्टुअर्ट गिटेल-बास्टेन कहते हैं, "इतनी विशाल आबादी की काउंटिंग करते समय कुछ 100 या शायद कुछ हज़ार लोग छूट सकते हैं. लेकिन, अगर काउंटिंग में कुछ मिलियन या एक अरब लोगों की संख्या छूट जाए, तो ये इस ग्रह पर मानव निवास के बारे में हमारी समझ को पूरी तरह से बदल देगी. वैज्ञानिकों को दशकों से किए गए डेटासेट रिसर्च पर पुनर्विचार करने से पहले कुछ और सबूतों की जरूरत होगी."
तीन चौथाई आबादी की प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर के बराबर
एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक, पृथ्वी की लगभग तीन चौथाई (74%) आबादी ऐसे देशों में रहती है, जहां प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर के बराबर या उससे कम है. यह व्यापक रूप से माना जाता है कि 2.1 प्रतिस्थापन स्तर की प्रजनन दर है. यानी एक महिला को अपने जीवनकाल में जितने बच्चे पैदा करने होंगे, उससे वह खुद और पिता दोनों की जगह ले सकेगी.विश्व की लगभग 33% आबादी यानी लगभग हर 3 में से 1 व्यक्ति ऐसे देश में रहता है, जहां प्रजनन दर प्रतिस्थापन दर के करीब है. इसमें भारत, ट्यूनीशिया और अर्जेंटीना शामिल हैं.
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