
Satyam Kumar
सत्यम, बिहार से हैं. उन्होंने LS College, मुजफ्फरपुर, बिहार से जर्नलिज्म की पढ़ाई की है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया से MA In Media Governance में मास्टर्स किया है. मास्टर्स के साथ ... और पढ़ें
डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के साथ ही वैश्विक राजनीति में हलचल तेज हो गई थी. ये हलचल अब रफ्तार पकड़ रही है. वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप और सत्ता परिवर्तन की कोशिशों के बाद दुनिया भर में अब चर्चा इस बात की है कि क्या अमेरिका की नजर दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड पर है? ट्रंप अपने पिछले कार्यकाल में भी ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा जता चुके हैं, जिसे तब डेनमार्क ने ‘हास्यास्पद’ बताकर खारिज कर दिया था. लेकिन अब रणनीतिक गलियारों में यह सवाल फिर से गूंज रहा है कि क्या अमेरिका इसे अपने नक्शे में शामिल करेगा और इससे उसे क्या आर्थिक व राजनीतिक लाभ होंगे.
वेनेजुएला में’ऑपरेशन लिबर्टी (Operation Liberty) और तेल संसाधनों पर नियंत्रण की कोशिशों के बाद ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की दिलचस्पी को महज इत्तेफाक नहीं माना जा सकता. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी संप्रभु देश या स्वायत्त क्षेत्र पर सीधा कब्जा करना युद्ध को आमंत्रण देना है. ग्रीनलैंड तकनीकी रूप से डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है. अमेरिका यहां ‘कब्जा’ करने के बजाय इसे ‘खरीदने’ या ‘पट्टे (Lease)’ पर लेने की रणनीति अपना सकता है ताकि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती ताकत को चुनौती दी जा सके.
अगर ग्रीनलैंड अमेरिका का हिस्सा बनता है, तो यह अमेरिका के लिए किसी ‘लॉटरी’ से कम नहीं होगा. ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे दुर्लभ खनिज (Rare Earth Elements) का विशाल खजाना छिपा है. ये वो खनिज हैं जिनके बिना स्मार्टफोन, चिप्स, इलेक्ट्रिक कार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम नहीं बन सकते. फिलहाल इन पर चीन का एकाधिकार है. इसके अलावा, यहां तेल और प्राकृतिक गैस के इतने भंडार हैं कि अमेरिका की ऊर्जा क्षेत्र से होने वाली सालाना कमाई कई गुना बढ़ सकती है. नए शिपिंग रूट खुलने से बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स के जरिए भी अरबों डॉलर का राजस्व मिल सकता है.
चीन लंबे समय से खुद को ‘नियर आर्कटिक स्टेट’ घोषित कर ग्रीनलैंड में बुनियादी ढांचे और खनन में भारी निवेश करने की कोशिश कर रहा है. चीन का मकसद आर्कटिक के जरिए यूरोप तक छोटा व्यापारिक मार्ग (Polar Silk Road) बनाना है. अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पा लेता है, तो चीन के पैर इस रणनीतिक क्षेत्र से पूरी तरह उखड़ जाएंगे. यह चीन के महाशक्ति बनने के सपने के लिए सबसे बड़ा झटका होगा, क्योंकि वह भविष्य के संसाधनों और व्यापारिक रास्तों की जंग हार जाएगा.
ग्रीनलैंड के लोग अपनी स्वतंत्रता और अपनी संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं. भले ही वह डेनमार्क का हिस्सा है, लेकिन वहां की अपनी संसद और सरकार है. ट्रंप का इसे खरीदने का प्रस्ताव ग्रीनलैंड के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाता है. स्थानीय नेताओं का साफ कहना है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है. वहीं, अमेरिका के लिए चुनौती यह है कि वह बिना किसी अंतरराष्ट्रीय विवाद के इस संप्रभु क्षेत्र को अपने पाले में कैसे लाए.
डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला अगर हकीकत बनता है, तो यह 21वीं सदी की सबसे बड़ी ‘रियल एस्टेट डील’ होगी. यह केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि भविष्य के संसाधनों की चाबी है. हालांकि, यह रास्ता इतना आसान नहीं है, क्योंकि डेनमार्क, रूस और चीन मिलकर इसका कड़ा विरोध करेंगे.
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