US Iran sign Memorandum: क्यों फिर से युद्ध शुरू होने का खतरा अभी बाकी है ? समझौते में इन अहम मुद्दों का नहीं है जिक्र- Explained

Written By: Farha Fatima Updated by: Farha Fatima
Updated Date:June 18, 2026 10:04 AM IST

अमेरिका और ईरान ने 14 पॉइंट वाले MOU पर इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर कर 60 दिनों के युद्धविराम और बातचीत पर सहमति जताई है. लेकिन यह अंतिम शांति समझौता नहीं है, इसलिए युद्ध का खतरा अभी भी बना हुआ है.

  • अमेरिका और ईरान ने 14 पॉइंट वाले MOU पर हस्ताक्षर कर 60 दिनों के सीजफायर पर सहमति दी है.
  • डील में परमाणु हथियार न बनाने, प्रतिबंध हटाने और होर्मुज़ खोलने का वादा शामिल है.
  • अंतिम समझौता 60 दिनों की बातचीत के बाद होगा और उस पर UN की मंजूरी का प्रस्ताव है.
  • न्यूक्लियर विवाद, मिसाइल कार्यक्रम और भरोसे की कमी के कारण युद्ध दोबारा शुरू होने का खतरा अभी भी बना हुआ है.

फ्रांस में G7 समिट के दौरान US-ईरान डील चर्चा का मुख्य विषय बनी. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका और इज़राइल की जंग को खत्म करने के लिए एक समझौते (मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग) पर इलेक्ट्रॉनिक रूप से हस्ताक्षर किए हैं.

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दोनों पक्षों का कहना है कि यह समझौता लागू हो गया है. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस समझौते में ईरान का परमाणु हथियार न बनाना/ न खरीदना, सभी मोर्चों पर जंग खत्म करना और होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलना शामिल है. ये सझना जरूरी है कि ईरान अमेरिका का ये समझौता युद्ध पूरी तरह खत्म होना नहीं माना जा सकता है. साइन किए गए'मेमोरैंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग' में 14 पॉइंट लिखें हैं. इसके तीसरे पॉइंट में लिखा है- अमेरिका और ईरान आपसी सहमति से ज़्यादा से ज़्यादा 60 दिनों में बातचीत करके आखिरी डील करने का वादा करते हैं. मतलब ये कि अभी आखिरी डील बाकी है. अभी सिर्फ दोनों देशों ने 60 दिन का समय लिया है, जिस दौरान वे अलग अलग पॉइंट पर बात करके हल निकालेंगे. और इन 60 दिनों में वर्तमान में चल रहे हमले रोकने की बात कही गई है. युद्ध शुरू होने का खतरा अभी क्यों बाकी है, यह समझने के लिए पहले ये समझिए कि किन मुद्दों पर प्लान करने का वादा इस समझौते के बाकी पॉइंट्स में किया गया है.

  1. अमेरिका और ईरान और मौजूदा युद्ध में उनके सहयोगी, लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य गतिविधियों को तुरंत और हमेशा के लिए खत्म करने की घोषणा करते हैं. वे यह भी वादा करते हैं कि अब से वे एक-दूसरे के खिलाफ कोई युद्ध या सैन्य कार्रवाई शुरू नहीं करेंगे. एक-दूसरे के खिलाफ बल प्रयोग या धमकी देने से बचेंगे और लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता सुनिश्चित करेंगे. अंतिम समझौता लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध की स्थायी समाप्ति और इस पैराग्राफ की अन्य शर्तों की पुष्टि करेगा.
  2. अमेरिका और ईरान एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने और एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा करते हैं.
  3. अमेरिका और ईरान बातचीत करने और अधिकतम 60 दिनों के भीतर (जिसे आपसी सहमति से बढ़ाया जा सकता है) अंतिम समझौता करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
  4. समझौते के चौथे पॉइंट में लिखा है, अमेरिका तुरंत ईरान से नौसैनिक नाकेबंदी और किसी भी तरह की रुकावट या बाधा को हटाना शुरू कर देगा, 30 दिनों के भीतर पूरी तरह से अपनी सेना वहं से हटा लेगा.
  5. ईरान अपनी पूरी कोशिश करके फारस की खाड़ी से ओमान सागर तक और इसके विपरीत दिशा में कमर्शियल जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के लिए व्यवस्था करेगा, जिसके लिए केवल 60 दिनों तक कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा. 30 दिनों के भीतर पूरी तरह से बहाल कर दिया जाएगा.
  6. ईरान, ओमान के साथ बात करेगा जिसमें वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में प्रशासन और समुद्री सेवाओं को तय करेगा. यह बातचीत फ़ारसी खाड़ी के अन्य देशों के साथ, लागू अंतरराष्ट्रीय कानूनों को ध्यान में रखते हुए की जाएगी.
  7. अमेरिका, ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर की एक निश्चित और आपसी सहमति वाली योजना विकसित करेगा. ऐसा वादा किया है. इस योजना को लागू करने का तरीका 60 दिनों के भीतर तय किया जाएगा. इसके लिए वित्तीय लेन-देन के लिए ज़रूरी सभी लाइसेंस, छूट और अनुमतीअमेरिका देगा.
  8. अमेरिका ने तय समय-सीमा के भीतर ईरान के खिलाफ़ सभी प्रकार के प्रतिबंधों को खत्म करने का वादा किया है.
  9. ईरान ने पुष्टि की है कि वह परमाणु हथियार हासिल नहीं करेगा और न ही विकसित करेगा. अमेरिका की तरफ से ईरान में पहले से जमा किए गए enriched को IAEA की देखरेख में साइट पर ही 'डाउन-ब्लेंडिंग' करेगा.
  10. अंतिम समझौता होने तक, अमेरिका और ईरान यथास्थिति (status quo) बनाए रखने पर सहमत हैं. ईरान दो साल के प्रोग्राम की मौजूदा स्थिति को बनाए रखेगा, औरअमेरिका कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा और न ही इस क्षेत्र में अतिरिक्त सेना तैनात करेगा.
  11. अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ईरानी कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पादों और उनसे बनी चीज़ों के एक्सपोर्ट के लिए छूट देगा. बैंकिंग लेन-देन, बीमा, ट्रांसपोर्टेशन वगैरह जैसी सभी संबंधित सेवाओं के लिए भी छूट दी जाएगी.
  12. अमेरिका, ईरान के फ्रीज़ किए गए फंड और एसेट्स को इस्तेमाल के लिए पूरी तरह उपलब्ध कराया जाएगा. अमेरिका इसके लिए सभी ज़रूरी लाइसेंस और मंज़ूरी जारी करने का वादा करता है.
  13. अमेरिका और ईरान इस बात पर सहमत हैं कि इस MOU के सफल कार्यान्वयन और अंतिम समझौते के भविष्य में पालन की निगरानी के लिए एक कार्यकारी तंत्र स्थापित किया जाएगा.
  14. अमेरिका और ईरान विशेष रूप से अंतिम समझौते के संबंध में बातचीत शुरू करेंगे. फाइनल समझौते (Final Deal) पर UN की आधिकारिक मुहर लगेगी और सभी पक्षों को उसके नियमों का पालन करना होगा. यानी फाइनल डील सिर्फ आपसी सहमति तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि UN के आदेश जैसी ताकत मिल जाएगी.

युद्ध होने का खतरा क्यों बाकी ?

युद्ध शुरू होने का खतरा अभी भी क्यों बाकी है? क्योंकि यह अंतिम समझौता नहीं है — सिर्फ 60 दिनों का ceasefire (युद्ध रोकने का अस्थायी समझौता) है. अगर बातचीत असफल हुई तो दोनों पक्ष फिर से लड़ाई का रास्ता चुन सकते हैं. ट्रंप ने खुद कहा है "अगर वे सही से व्यवहार नहीं करेंगे, तो हम फिर उन पर भारी बमबारी करेंगे.

अभी भी क्या हैं अनसुलझे मुख्य मुद्दे-

1. ईरान के न्यूक्लियर कार्यक्रम का अब क्या होगा ?

Reuters के मुताबिक ईरान का यूरेनियम enrichment, स्टॉकपाइल (जमा uranium) और जांच-पड़ताल पर दोनों पक्षों में बहुत बड़ी असहमति है. ईरान पहले भी अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी IAEA के नियम तोड़ चुका है.

2. मिसाइलें और प्रॉक्सी ग्रुप पर भी क्या कोई रोक लगी है ?

ईरान हिजबुल्लाह, हूती आदि गुटों को जो समर्थन देता है, उस पर कोई ठोस रोक नहीं है. लेबनान में ceasefire का जिक्र है, लेकिन लंबे समय तक इन गुटों को निशस्त्र (disarm) करने का कोई साफ प्लान नहीं है.

3. ईरान पर लगे प्रतिबंध और उनका पालन करने पर क्या अपडेट है ?

ईरान को कुछ राहत मिल रही है, लेकिन वो शर्तों पर आधारित है. ईरान कह रहा है कि उसे अमेरिका पर "गहरा अविश्वास" है. भरोसे की बहुत बड़ी कमी है. अमेरिकी अधिकारी खुद मान रहे हैं कि ईरान के वादों पर भरोसा करना मुश्किल है.

4. क्या इजरायल ने इस डील को माना है ?

इजरायल ने इस डील को साफ मना कर दिया है- वो ईरान को और कमजोर करके दबाना चाहता है. ईरान ने इस युद्ध को अपनी "जीत" बताया है, इसलिए वो अपने मिसाइल और न्यूक्लियर ठिकानों को फिर से मजबूत बना सकता है.

  • इलाके की स्थिति:हूती और दूसरे मिलिशिया ईरान के पूरा कंट्रोल में नहीं हैं.
  • ईरान Hormuz की खाड़ी में तेल के जहाजों को परेशान या टोल वसूलने की कोशिश कर सकता है.
  • तेल की कीमतें ऊपर-नीचे होती रहेंगी.

इन सभी बातों के मद्देनजर कह सकते हैं कि यह MOU सिर्फ युद्ध रोकने और सांस लेने का समय देने वाला अस्थायी युद्धविराम संधि है. अगर अगले 60 दिनों में न्यूक्लियर क्षमता और इलाकाई प्रभाव जैसे बड़े मुद्दों पर कोई ठोस तोड़फोड़ नहीं हुई, तो फिर से लड़ाई भड़कने का खतरा बहुत ज्यादा रहेगा.

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