
Gaurav Barar
गौरव बरार (Gaurav Barar) एक अनुभवी पत्रकार और कंटेंट विशेषज्ञ हैं जिनके पास 10 साल से ज्यादा का अनुभव है. वर्तमान में, इंडिया.कॉम में बतौर चीफ सब एडिटर अपनी सेवाएं ... और पढ़ें
Israel Iran War: मध्य पूर्व में पिछले कई हफ्तों से जारी जंग के बीच एक राहत भरी खबर सामने आई है. अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम (Ceasefire) पर सहमति बन गई है. लेकिन इस समझौते के पीछे की असली कहानी अब निकलकर सामने आ रही है.
ताजा रिपोर्ट्स और न्यूयॉर्क टाइम्स और अंतरराष्ट्रीय मीडिया एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस के खुलासे के मुताबिक, इस सीजफायर को मुमकिन बनाने में सबसे बड़ी भूमिका किसी और की नहीं, बल्कि चीन की रही है.
जहां दुनिया की नजरें अमेरिकी हवाई हमलों और ईरान की धमकियों पर टिकी थीं, वहीं चीन चुपचाप पर्दे के पीछे से अपनी बिसात बिछा रहा था. रिपोर्ट्स के अनुसार, चीनी राजनयिक लगातार ईरानी अधिकारियों के संपर्क में थे. तेहरान के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार होने के नाते, चीन ने अपने आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल किया.
चीन ने ईरान को यह समझाने में सफलता हासिल की कि युद्ध का लंबा खिंचना न केवल वैश्विक व्यवस्था के लिए, बल्कि स्वयं ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए भी आत्मघाती साबित होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग ने अकेले यह काम नहीं किया.
चीनी अधिकारियों ने पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे क्षेत्रीय मध्यस्थों के साथ मिलकर एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया था. यह ड्रैगन का वही प्रभाव था जिसने ईरान को मेज पर आने के लिए मजबूर किया, जबकि इससे पहले कई अन्य देशों की कोशिशें नाकाम रही थीं.
चीन की इस सक्रियता के पीछे सिर्फ शांति का उद्देश्य नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बचाना भी था. चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने हाल ही में गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि यह युद्ध असल में कभी शुरू ही नहीं होना चाहिए था.
चीन को डर था कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लंबे समय तक बंद रहा, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी और वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी. इस समझौते के तहत अब यह रणनीतिक जलमार्ग जल्द ही खोला जाएगा, जिससे वैश्विक बाजारों ने राहत की सांस ली है.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने तीन ईरानी अधिकारियों के हवाले से बताया है कि सीजफायर के लिए पाकिस्तान की कोशिशों के साथ-साथ, चीन ने भी लचीलापन दिखाने और तनाव कम करने के लिए दखल दिया. रिपोर्ट में जिन ईरानी अधिकारियों का जिक्र है, उन्होंने यह भी बताया कि नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई, जिन्हें अपने पिता का उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के बाद से अब तक सार्वजनिक रूप से नहीं देखा गया है, ने इस युद्धविराम को मंजूरी दी है.
इस घटनाक्रम का एक दिलचस्प पहलू पाकिस्तान की मध्यस्थता का विफल होना भी है. चीन से पहले पाकिस्तान ने 45 दिनों के युद्धविराम का प्रस्ताव पेश कर बिचौलिया बनने की कोशिश की थी. हालांकि, ईरान ने पाकिस्तान के प्रस्ताव को यह कहते हुए सिरे से खारिज कर दिया था कि वह केवल अपनी शर्तों पर समझौता करेगा. ईरान का पाकिस्तान के प्रस्ताव को ठुकराना और चीन की बात मानना यह दर्शाता है कि ईरान को इस समय केवल बीजिंग पर ही कूटनीतिक भरोसा है.
भले ही दो सप्ताह के लिए युद्ध थमता दिख रहा हो, लेकिन ईरान के तेवर अभी भी बेहद तीखे हैं. ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने सीजफायर की पुष्टि तो की है, लेकिन साथ ही एक कड़ी चेतावनी भी जारी की है. ईरान ने स्पष्ट किया है कि शुक्रवार से इस्लामाबाद में अमेरिका के साथ बातचीत शुरू होगी, लेकिन इसे युद्ध का अंत न समझा जाए.
ईरान की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया, “हमारी उंगलियां अभी भी ट्रिगर पर हैं. यदि दुश्मन ने युद्धविराम के दौरान कोई भी छोटी गलती की या उकसावे की कार्रवाई की, तो उसका जवाब पूरी ताकत और विनाशकारी हमले से दिया जाएगा.” यह बयान साफ करता है कि जमीन पर अविश्वास की खाई अभी भी बहुत गहरी है.
बहरहाल, अगले दो हफ्ते पूरी दुनिया के लिए बेहद अहम होंगे. अगर इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत सफल रहती है, तो यह मध्य पूर्व में एक बड़े युद्ध को टालने का ऐतिहासिक मौका होगा.
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