दोहा: अमेरिका और अफगानिस्तान के आतंकी गुट तालिबान के बीच वर्षो की लंबी वार्ता के बाद शनिवार को कतर की राजधानी दोहा में शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए. इस बीच, अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा कि तालिबान से हुआ समझौता तभी कारगर साबित होगा, जब तालिबान पूरी तरह से शांति कायम करने की दिशा में काम करेगा. इस समझौते के साथ ही अमेरिका और अफगान तालिबान ने 18 वर्षीय लंबे रक्तपात को समाप्त करने की पहल पर काम किया है. Also Read - UPDATE, अफगानिस्तान में गुरुद्वारे पर हुए आतंकवादी हमले में 27 लोगों की मौत, 8 घायल

द न्यूज इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान के उपनेता और मुख्य वार्ताकार मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने अफगानिस्तान के इस्लामिक अमीरात की ओर से शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए, जबकि अमेरिकी दूत जल्माय खलीलजाद ने वाशिंगटन की ओर से हस्ताक्षर किए. हस्ताक्षर समारोह में अफगान तालिबान व अफगान सरकार के अधिकारियों के साथ ही और अमेरिका, कतर और पाकिस्तान के नेताओं ने भी भाग लिया. Also Read - काबुल में आतंकियों ने गुरुद्वारे में घुसकर किया हमला, 11 की हुई मौत, ISIS ने ली जिम्मेदारी

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी भी पाकिस्तान की ओर से दोहा में अमेरिका-तालिबान शांति समझौते पर हस्ताक्षर के गवाह बनें. इस दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने शामिल रहे. इससे पहले शनिवार को कुरैशी ने दोहा में खलीलजाद से मुलाकात की थी और अमेरिका व तालिबान ने कतर की राजधानी में एक ऐतिहासिक शांति समझौते की तैयारी भी की थी. कुरैशी ने खलीलजाद से मुलाकात के बाद कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को युद्ध-विराम वाले देश के पुनर्निर्माण और विकास में मदद करने की आवश्यकता है. Also Read - काबुल में आतंकी ने गुरुद्वारे में घुसकर हमला किया, चार की मौत

अमेरिका और तालिबान के बीच हुए शांति समझौते पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि अफगानिस्तान में हिंसा को समाप्त करने और स्थायित्व तथा शांति लाने के लिए सभी अवसरों का समर्थन करना भारत की नीति है.

इस दौरान पोम्पियो ने कहा कि लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष को समाप्त करने के लिए अमेरिका और तालिबान सहमत हो गए हैं. उन्होंने कतर के अमीर को वार्ता में उनकी सहायता के लिए धन्यवाद भी दिया. अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा, “हमने दशकों की शत्रुता का अंत किया है. आज हम जिस समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे, वह हमारे कार्यों का एक सच्चा वसीयतनामा है.”

तालिबान के सूत्रों ने बताया है कि अमेरिका और अफगान सरकार तालिबान के 5,000 कैदियों को रिहा करेंगे. वहीं इसके बदले में तालिबान अफगान सरकार के 1,000 कैदियों को मुक्त करेगा. अमेरिका ने तालिबान से एक गारंटी के बदले अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस लेने की समयसीमा भी घोषित कर दी है.

तालिबान के साथ हुए समझौते के मुताबिक अमेरिका अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या घटाकर 8,600 करने के लिये प्रतिबद्ध है, लेकिन अधिकारियों ने कहा कि अगर अफगान पक्ष किसी समझौते पर पहुंचने में नाकाम रहता है तो अमेरिका अपने सैनिकों की वापसी के लिये बाध्य नहीं है. युद्ध प्रभावित रहे अफगानिस्तान में स्थायी शांति के लिये अपने प्रयासों और तालिबान के साथ समझौते पर किये गए हस्ताक्षर के तहत अमेरिका अफगानिस्तान में अपने बलों की संख्या शुरू में ही घटाकर 8,600 सैनिकों तक करने के लिये प्रतिबद्ध है. अफगानिस्तान में अभी करीब 13,000 अमेरिकी सैनिक हैं.

यह वह स्तर है जिसे अफगानिस्तान में अमेरिकी और नाटो बलों के कमांडर, जनरल स्कॉट्स मिलर ने उनके मिशन को पूरा करने के लिये आवश्यक बताया था. एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने कहा कि जवानों की वापसी और समझौता एक समानांतर प्रक्रिया है. विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और भारत समेत कई अन्य विदेशी राजनयिकों की मौजूदगी में अमेरिका ने दोहा में तालिबान के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किये. नाम ना जाहिर करने की शर्त पर अधिकारी ने कहा, “हमारी वापसी इस समझौते से जुड़ी है और शर्तों पर आधारित है. अगर राजनीतिक समझौता विफल होता है, अगर वार्ता नाकाम होती है तो ऐसी कोई बात नहीं है कि अमेरिका सैनिकों की वापसी के लिये बाध्य है.”

उल्लेखनीय है कि 9/11 हमले के बाद अमेरिका ने 2001 में तालिबान के खिलाफ जंग के लिए अपने सैनिक अफगानिस्तान भेजे थे. यहां आतंकी गुटों के साथ लड़ाई में उसके हजारों सैनिक मारे जा चुके हैं. अमेरिका अब अफगानिस्तान से अपने सैनिकों की वापसी चाहता है. इसके लिए उसकी अफगान सरकार और तालिबान प्रतिनिधियों के साथ लंबे वक्त से चर्चा चल रही थी.