ट्रंप को हर हाल में क्यों चाहिए ग्रीनलैंड! यहां बात सिर्फ तेल की नहीं, जानिए 80% बर्फ से ढके द्वीप में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा अमेरिका?

US Greenland News: वेनेजुएला में सफल सैन्य ऑपरेशन के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अगला लक्ष्य ग्रीनलैंड है. ट्रंप इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य बता रहे हैं.

Published date india.com Published: January 8, 2026 8:50 AM IST
ट्रंप को हर हाल में क्यों चाहिए ग्रीनलैंड! यहां बात सिर्फ तेल की नहीं, जानिए 80% बर्फ से ढके द्वीप में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा अमेरिका?

Trump Greenland Dispute: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर दुनिया को अपने उस बयान से चौंका दिया है, जिसे कुछ साल पहले तक एक रियल एस्टेट डील का मजाक समझा जाता था. ट्रंप ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करना अब केवल एक इच्छा नहीं, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्य आवश्यकता है.

हाल ही में वेनेजुएला में हुए एक बेहद साहसिक और विवादास्पद सैन्य ऑपरेशन के बाद, जिसमें अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया, ट्रंप की ग्रीनलैंड संबंधी टिप्पणियों को अब वैश्विक समुदाय गंभीरता से ले रहा है.

वेनेजुएला से ग्रीनलैंड तक शक्ति प्रदर्शन

3 जनवरी 2026 को अमेरिकी विशेष सैन्य बलों ने वेनेजुएला की राजधानी काराकस में छापेमारी कर मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में लिया और उन्हें सीधे न्यूयॉर्क ले आए. इस घटना ने साबित कर दिया कि ट्रंप प्रशासन अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और संप्रभुता के पुराने नियमों को बदलने की तैयारी में है.

व्हाइट हाउस के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ स्टीफन मिलर ने स्पष्ट कर दिया है कि ग्रीनलैंड हासिल करने के लिए सैन्य कार्रवाई भी एक विकल्प है. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानूनों को कागजी नियम बताते हुए कहा कि शक्ति पर आधारित इस दुनिया में अमेरिका के हितों के आगे कोई नहीं टिकेगा. ट्रंप ने लुइसियाना के गवर्नर जेफ लैंड्री को ग्रीनलैंड के लिए विशेष दूत नियुक्त कर अपने इरादे साफ कर दिए हैं.

अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड का ‘रणनीतिक गणित’

ग्रीनलैंड, जो भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका का हिस्सा है लेकिन राजनीतिक रूप से डेनमार्क का एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है, अमेरिका के लिए पांच कारणों से महत्वपूर्ण है.

मिसाइल डिफेंस और सर्विलांस

आर्कटिक क्षेत्र में स्थित ग्रीनलैंड अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच एक बफर जोन का काम करता है. यहां पहले से मौजूद थुले एयर बेस अमेरिका की मिसाइल चेतावनी प्रणाली का केंद्र है. पूर्ण नियंत्रण मिलने से अमेरिका यहां अपनी सैन्य निगरानी को अभेद्य बना सकेगा.

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चीन-रूस की बढ़ती सक्रियता

आर्कटिक में रूस अपनी सैन्य चौकियां बढ़ा रहा है और चीन खुद को नियर आर्कटिक स्टेट बताकर वहां पैर जमाने की कोशिश कर रहा है. ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जा कर इस पूरे क्षेत्र में रूस और चीन की घेराबंदी करना चाहते हैं.

पिघलती बर्फ और नए समुद्री मार्ग

ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है. इससे भविष्य में एशिया और यूरोप के बीच नए और छोटे शिपिंग रूट्स खुलेंगे. इन रूटों पर प्रभुत्व जमाना भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने जैसा है.

खनिजों का खजाना

ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे तेल, गैस और सबसे महत्वपूर्ण रेयर अर्थ एलिमेंट्स के विशाल भंडार दबे हैं. वर्तमान में इन दुर्लभ खनिजों पर चीन का 90% तक नियंत्रण है, जिनका उपयोग स्मार्टफोन से लेकर फाइटर जेट्स बनाने में होता है. अमेरिका इस निर्भरता को खत्म करना चाहता है.

ट्रंप के इस कदम को विशेषज्ञ 21वीं सदी का एम्पायर बिल्डिंग प्रोजेक्ट कह रहे हैं. यह 19वीं सदी के उन अमेरिकी राष्ट्रपतियों की याद दिलाता है जिन्होंने अमेरिका का विस्तार किया था. थॉमस जेफरसन जिन्होंने फ्रांस से लुइसियाना क्षेत्र खरीदा. विलियम मैकिनले जिन्होंने हवाई द्वीप को अमेरिका से जोड़ा. वहीं ट्रंप वेनेजुएला के तेल भंडारों पर नियंत्रण हासिल करने के बाद, वे अब उत्तरी ध्रुव तक अमेरिकी झंडा गाड़ना चाहते हैं.

यूरोप और कनाडा की तीखी प्रतिक्रिया

डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसेन ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है, वह अपने लोगों का है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका बल प्रयोग करता है, तो यह नाटो के अंत की शुरुआत होगी. फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और इटली जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन बताया है.

कनाडा ने भी इस स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एक उच्च-स्तरीय टीम तैनात की है, क्योंकि ग्रीनलैंड के भाग्य का असर सीधे तौर पर कनाडा की सीमाओं और आर्कटिक दावों पर पड़ेगा.

क्या यह संभव है?

हालांकि ट्रंप प्रशासन सैन्य विकल्प की बात कर रहा है, लेकिन हकीकत में इसे हासिल करना बेहद जटिल है. इसके लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी और अरबों-खरबों डॉलर के बजट की आवश्यकता होगी. यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र के कड़े कूटनीतिक विरोध का सामना करना पड़ेगा. डेनमार्क और ग्रीनलैंड के स्थानीय लोगों की सहमति के बिना यह एक जबरन कब्जा कहलाएगा.

रिटायर्ड एडमिरल जेम्स स्टाव्रिडिस और सीनेटर क्रिस मर्फी जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की वेनेजुएला में मिली सफलता ने उनके आत्मविश्वास को इतना बढ़ा दिया है कि अब वे भूगोल बदलने से भी पीछे नहीं हटेंगे. यह न केवल अमेरिकी विदेश नीति में एक युगांतकारी बदलाव है, बल्कि शीत युद्ध के बाद वैश्विक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है.

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