सहा वर्षाचे असताना गुलजार यांनी आपली जन्मभूमी सोडली आणि वयाच्या ७८ व्या वर्षी त्यांना आपल्या मायदेशी परतण्याची संधी मिळाली. एवढ्या वर्षात गुलजार यांनी अनेक लेखन केलं. आणि त्यांच्या त्या प्रत्येक लेखनातील अनोखी नजाकत वाचकांनी उचलून धरली.

गुलजार से अलग कुछ नहीं

माझी प्रत्येक रचना मग ती नज्म असो, शायरी असो, गोष्ट असो वा कविता असो ती माझ्यापेक्षा वेगळी असूच शकत नाही. मी जे लिहीतो किंवा लिहीण्यासाठी मी जे शब्द निवडतो खरं म्हणजे मी त्याच शब्दांमध्ये असतो. रोजचं जीवन हे माझ्या लिखाणाचं मूळ आहे. आणि इथूनच मला लिखाणाची प्रेरणा मिळते. हे शब्द मला ऊर्जा ही देतात आणि आनंद ही.

अशा शब्दात आपल्या भावना व्यक्त करणाऱ्या गुलजार साहेबांच्या ११ अनोख्या रचना 

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आधे पौने पूरे चाँद, जितना था सब माल गया बारह महीने जमा किए थे जेब काटकर साल गया – गुलजार

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कोई आहट न सरसराहट है, जिन्द़गी सिर्फ मुस्कुराहट है – गुलजार

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मै कभी सिगरेट पीता नहीं मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि माचिस है बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ – गुलजार

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एक ही सूरज है सबके लिए… वही धूप देता है, वही छांव करता है अगर आप धूप मैं हैं तो इन बच्चों पर छांव कीजिए और आप छांव मैं हैं तो इन पर धूप आने दीजिए ये विकलांग बच्चे, मोहताज नही, जरूरतमंद है

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मैं कुछ न करता तो भी यही होता – अस्सी का हो जाता

मगर ये ना होता जो बेशुमार दोस्तो से, चहाने वालों

से बेशुमार दुआयें और मुबार्कबादे मिली है

हालांकि बहुत मुम्किन है

कि हर बरस अगर दुआयें न मिलतीं तो

मैं अस्सी का हो ही न हो पाता

तुस्सी हों तो में अस्सी का हू – गुलजार

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कल के अख़बार का कागज़ ही था जो काम आया

ख़बरें तो आरज़ी थीं, पढ़ते ही बस बीत गईं – गुलजार

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मुन्ने ने माँ को बुला के पुछा – “माँ कहा से आया था मै?

और तुम को मिला कहाँ”?

अध रोयी – अध हसती माँ

छाती से लगा कर बोली थी

“इच्छा बन कर आये थे

और तुम मेरे मन में थे

तुम मेरे बचपन के “गुडियाँ खेल” मैं थे

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साँस लेना भी कैसी आदत है

जिये जाना भी क्या रवायत है

कोई आहट नहीं बदन में कहीं

कोई साया नहीं है आँखों में

पल गुजरते है ठहरे ठहरे से

जिये जाते हैं जिये जाते हैं

पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं

इक सफ़र है जो बहता रहता है

कितने बरसों से, कितनी सदियों से

जिये जाते हैं, जिये जाते हैं….

आदतें भी अजीब होती हैं…..

गुलजार